भीड़ में भी मैं अकेला... एक शहरी शादी की कहानी
शहर की एक आलीशान शादी में गया था। भीड़ थी, चकाचौंध थी, शोर था... लेकिन दिल में एक खालीपन था। सब कुछ होते हुए भी, कुछ अधूरा-सा महसूस हो रहा था।
गांव की शादी याद आ गई — जहाँ रौनक सिर्फ स्टेज तक सीमित नहीं होती, वो हर गली में, हर चेहरे पर, हर आंगन में दिखाई देती है। शादी कोई एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे गांव की साझा खुशी होती है। और शहर? शहर में तो शादी शुरू हुई नहीं कि खत्म भी हो जाती है।
"चलो, एक शादी है..."
मेरा दोस्त रंजीत अपने कुछ दोस्तों के साथ शहर की एक शादी में जा रहा था। कहने लगा, "चल ना यार, बस टाइमपास ही तो करना है!"
वैसे भी कोई काम नहीं था, तो मैं भी चल दिया।
शादी शहर के एक भव्य पैलेस में थी। शाम 7 बजे पहुंचे — पार्किंग में ही 500 से ज़्यादा गाड़ियाँ लगी थीं। चारों तरफ चमचमाती लाइट्स, रंग-बिरंगे फूल, और गेट पर खड़े मुस्कुराते स्वागतकर्ता। पैलेस के भीतर दाखिल होते ही लगा जैसे किसी मेले में आ गए हों — लोग टहलते हुए, सेल्फी लेते हुए, ड्रोन की ओर ताकते हुए।
हर चेहरा सजावट का हिस्सा लग रहा था, पर किसी में अपनापन नहीं दिखा।
जुड़ाव नहीं, प्रदर्शन ज्यादा
हम सबने घरवालों के साथ औपचारिक सी तस्वीरें खिंचवाई और फिर सब अपने-अपने रास्ते हो लिए। एक कोने में शराब की स्टाल सजी थी — भीड़ वहीं उमड़ रही थी। मैं वहां से हट गया और खाने-पीने के स्टाल की ओर चला गया।
टिक्की, चाट, रबड़ी, कोल्ड ड्रिंक, खीर, आइसक्रीम... इतना सब कुछ था, लेकिन स्वाद के साथ यादें नहीं थीं। सब कुछ दिखाने के लिए था, महसूस करने के लिए नहीं।
खाने के बाद जब मिठाई लेने गया, तो देखा हर स्टाल पर कुछ अनजाना चेहरा मुस्कुरा रहा था। किसी की आँखें मिलती नहीं थीं, कोई बात करता नहीं था। सब बस अपनी-अपनी प्लेट और मोबाइल स्क्रीन में खोए हुए।
शादी थी, लेकिन अपनापन नहीं था
रात के 10 बज चुके थे। वापस गाड़ी में बैठे और लौट आए। उस पूरी शादी में, इतनी भीड़ में, मैं बस ये सोचता रहा —
“इतनी रौनक के बीच भी मन क्यों सूना है?”
शायद इसलिए कि रौनक उन लोगों के साथ ही मायने रखती है जिनसे दिल जुड़ा हो।
शायद इसलिए कि शादी की असली मिठास रिश्तों में होती है, खाने में नहीं।
और शायद इसलिए कि अपने तो भीड़ में भी अपनापन दे जाते हैं... और गैर, अकेलापन।

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